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Saath.

तुम आकाश हो अगर कभी मैं रहूंगी धरा तुम्हारी तुम पेड़ हो अगर कभी मैं रहूंगी छाया तुम्हारी तुम अगर फूल बन जाओ मैं महकूँगी तुम्हारी महक तुम अगर सागर बन जाओ तो छल्कुंगी बनकर तुम्हारी लेहेर तुम मेरे तन के कण-कण में बसे रहोगे मैं तुम्हारे मन के हर घर में बसी रहूंगी आएगा … Continue reading Saath.

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